आहार भगवान का प्रसाद है
शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनम।
धर्म का साधन यह शरीर है
धर्म का अर्थ सनातन शास्त्रों में कर्तव्य कर्म कहा गया है। धर्म का अर्थ केवल मूर्ति के सामने दीपक जलना और जल चढ़ाना नहीं है.. .इसका उद्देश्य तो भगवान के प्रति समर्पण भाव जागृत करना मात्र है
हर व्यक्ति का अपना धर्म है जैसे बाल्यावस्था में बालक का धर्मं पठन पाठन करना ,अपने बड़ों का आदर करना ,उनकी आज्ञा मानना है!
युवावस्था में युवाओं का धर्म सात्विक वृत्ति से धनार्जन करना ,पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करना तथा सामाजिक और आर्थिक रूप से अपने को प्रतिस्थापित करना है। वृद्धावस्था में वृद्धों का धर्म समाज सेवा तथा समाज का मार्गदर्शन करना है. तथा स्त्रियों का धर्म परिवार का पालन पोषण करना है. आज की परिस्थिति में पति पत्नी दोनों मिलकर धनार्जन करते हैं परन्तु बच्चों को संस्कारित माता ही करती है,
कहा गया है
मदर इस थे फर्स्ट टीचर
यह निश्चित है कि किसी भी देश या समाज के निर्माण में युवाओं का सबसे बड़ा योगदान है। यदि युवा धर्मच्युत होंगे तो समाज बिगड़ेगा।
धर्म को साधने के लिए शरीर का साधना आवश्यक ही नहीं अतिआवश्यक है. कहा गया है
पहला सुख निरोगी काया
शरीर को शुद्ध रखने के लिए आहार की शुद्धि आवशयक है। अब प्रश्न आता है की आहार की शुद्धि कैसे हो। कुछ उदहारण से समझना होगा
हम एक अच्छे रेस्टोरेंट में गए ,सबा कुछ बहुत अच्छा अच्छा है.अम्बिएंस सलीके से कपडे पहनेर बेयरे। हम अपना भोजन आर्डर करते हैंऔर अपनबे भोजन के आने की प्रतीक्षा करने लगते हैं. हल्का फुल्का सुखद सा वातावरण है,अचानक एक चूहा कहीं से निकल कर आपके सामने से होता हुआ किचन की तरफ भाग जाता है.. कैसा लगा आपको ,आपका पहला रिएक्शन होगा कि यहाँ hygene है भी या नहीं. यानि मन में संदेह उत्पन्न होगा आहार की शुद्धि को लेकर और आपके मन में वितृष्णा उत्पन्न होगी भोजन के लिए
पिछले दिनों जब कोरोना का समय था,लोग बाहर भोजन मंगाते थे तो शुद्धि के ध्यान रखते थे. भोजन बेचने वालों की भी टैग लाइन हुआ करती थी
UN TUOCHED BY HANDS यानि वो आपको आहार के शुद्ध होने की गारंटी देना चाहते थे.
भारतीय परंपरा में आहार शुद्धता सर्वोपरि थी /रसोई या पाक शाला में स्त्रियां या रसोइया बिना नहाये नहीं जाते थे
पाक सहला में भोजन भगवान् के लिए बनाया जाता था.आज भी कुछ परिवार जो लड्डू गोपाल जी की आराधना करते हैं,भगवान के लिए प्रसाद बनाते हैं फिर उसे भगवन का भोग लगा कर ग्रहण करते है,
आज आवश्यकता हैं कि हम आहार विचार पूर्वक करें,यानि कुछ भी कहने के पूर्व सोचें. कि क्या यह उपयुक्त है और कुछ बातों का ध्यान रखें
यथा संभव घर का बवाना भोजन करें.
भोजन अपने लिए न बना कर भगवान के लिए बनायें,ऐसी भावना करें
भोजन बनाने के बाद उसका भगवान को भोग लगाएं.. भोजन यथासंभव सात्विक हो
जैसे रेस्टॉरेंट में चूहगे को देखते ही विचलित हुए थे क्यों कि वह प्रत्यक्ष था ,वैसे ही उस रेस्टॉरेंट की रसोई में क्या क्या अशुद्ध है हमें पता नहीं क्योंकि वह भोजन बेचने के लिए बना रहा है भगवान का प्रसाद नहीं ,.उसकी भावना पूर्ण रूप से व्यावसायिक है,जिस प्रकार उसकी रसोई हमारे लिए अप्रत्यक्ष है और उसकी भावना भी.उसी तरह इस स्थूल जगत के अलावा एक सूक्ष्म जगत भी है जो कि अप्रत्यक्ष है,वचः आहार शुद्धि के दवारा हमारे संस्कारों और जीवन को सवारंता है।
एक दिन आप स्वयं अनुभव करें नहा धो कर साफ़ कपडे पहन कर रसोई में जाएँ और इस भावना से भोजन बनायें कि मै भगवान के लिए भोग बना रहा/रही हूँ. फिर उस आनंद को अनुभव कीजिये. पैरिवार के सभी सदस्य उस भोजन की प्रशंसा करेंगे.. बिना नहाये ,गंदे विचारों वाले,कामी ,क्रोधी ,वैर भाव रखने वाले वयक्ति के हाथ का भोजन नहीं करना चाहिए
यह सत्य है कि आहार तैयार करने वाले मनुष्य के स्वास्थ्य और विचारों का प्रभाव हमारे मन और शरीर पर पड़ता है.