विचार जीवन में सर्वोपरि है! कहा गया है ! “A man is what he thinks.”
हम वही होते है जो हम सोचते है! स्वस्थ रहना हर व्यक्ति की इच्छा होती है! कोई असवस्थ नहीं रहना चाहता क्योकि कहा गया है पहला सुख निरोगी काया! स्वस्थ रहने के लिए हमे आहार और विचार दोनों पर नियंत्रण रखना आवश्यक है!
“ The wish for healing as always been half of Health”
यदि हमे अच्छे स्वस्थ की कामना रखनी है तब हमे अच्छे आहार का विचार करना ही होगा! आहार और विचार का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है! तभी कहा गया है “जैसा खाए अन्न, वैसा होय मन”
ईश्वर ने जीव मात्र को ये विवेक दिया है की क्या हमारे खाने योग्य है और क्या नहीं! शेर मांस खाता है और गाय भैंस चारा! बकरी आंक खा लेती है, कबूतर मांस नहीं खाता जबकि बाकि सभी पक्षी iमांस भक्षी है! इसी प्रकार मनुष्ये को प्रकृति ने शाकाहारी बनाया है!
आहार का विचार से घनिष्ठ सम्बन्ध है तो निश्चित रूप से हमे भक्ष्य-अभक्ष्य के प्रति विचार करना चाहिए! भौगोलिक आध्यात्मिकऔर नैतिक दृष्टि से क्या उचित है ये विचार करना चाहिए!
ये कृपा केवल भगवान ने मनुष्ये पर की है कि वह इस्थिति और परिस्थति को ध्यान में रखकर विवेक पूर्ण तरीके से निश्चित करे! यह विचार अत्यंत आ वश्यक है कि हमारा आहार कैसा हो, कितना हो, और किस समय हो! उदाहरण स्वरूप जो लोग शारीरिक श्रम नहीं करते उनका आहार निश्चित रूप से उनसे अलग होगा जो शारीरिक श्रम करते है! भोजन का आयु से भी गहरा रिश्ता है! बढ़ते बच्चे का भोजन वृद्ध लोगो के अपेक्षा अधिक शक्तिशाली होगा!
जब हम अनुकूल आहार नहीं लेते तो मोटापा पेट की समस्या और अन्य समस्या से घ्रस्त होते है!
क्या ये अच्छा हो की हम कुछ भी आहार लेने से पहले ये विचार करे की मेरे लिए क्या उचित है और क्या अनुचित है! हमारा प्रिय आहार सामने आते ही हम अपना नियंत्रण खो देते है और बिना विचारे टूट पड़ते है! कोई विवाह आदि उत्सवों पर इतना खा लेते है की अपच हो जाता है और फिर अपच और पेट ख़राब के लिए दवाई लेते है अक्सर प्लेट इतनी भर लेते है कि बाद में खाना प्लेट में छोड़ना पड़ता है और आहार का अनादर होता है
आहार भगवान का दिया हुआ प्रसाद है इस जीवन को सुचारु रूप से चलने के लिए इसिलए बहुत सोच विचार कर ईश्वर का ध्यान धन्यवाद करते हुए ही आहार ग्रहण करना चाहिए!