आज हम आहार की शुद्धता को सबसे कम आवश्यक समझने लगे है! कुछ उदाहरण देखिये!
- प्रातः ऑफिस के लिए तैयार हो रहे है! सब कुछ तैयार होकर नाश्ते का समय नहीं बचता और सुबह का नाश्ता भागम भाग में होता है! या फिर रस्ते में चलते चलते ।
- ऑफिस या दुकान पर बैठे है कुछ भूख लगी या कुछ खाने खाने का मन, कैंटीन चले गए या ऑनलाइन कुछ आर्डर कर दिए!
- सुबह जल्दी जल्दी में खाना नहीं बन पाया कोई बात नहीं ऑनलाइन आर्डर कर देंगे!
- पति पत्नी दोनों काम पर से घर वापस आते है, खाना बनाने का मूड नहीं है कोई बात नहीं ऑनलाइन मंगवा लेते है!
अक्सर ये सब जंक फ़ूड होता है जिसकी शुद्धता का हमे दूर तक कुछ पता नहीं होता!
पूर्व में आहार को प्रसाद समझा जाता था जैसे कि गुरुद्वारा या कुछ मंदिरो में आप देखते है जहां आहार को प्रसाद बोला जाता है! आहार की पवित्रता सर्वोपरि होती है! किसी भी घर की रसोई इतना हे पवित्र जगह है जितना की मंदिर! पूर्व में बिना नहाये लेडीज रसोई में नहीं जाती थी!
भोजन बनाने के बाद परिवार की लोग रसोई घर में ही बैठ कर भोजन करते थे! भोजन को रसोई घर से बाहर नहीं लाया जाता था! भक्ष्य और अभक्ष्य का पूरा ध्यान रखा जाता था! अच्छे समृद्ध परिवारों में रसोइये का साफ़ होना, कुरूप न होना, स्वस्थ होना आवश्यक गुण थे! जो वस्तुए खाद्य आहार बनाने के लिए प्रयुक्त होते थे उनको बीन फटक कर साफ़ करना अनिवार्य था! ताकि कूड़ा करकट बाल आदि साफ़ हो जाये!
जिन पात्रों में भोजन रखा जाता था या किया जाता था वो साफ़ राख से धुल कर properly sensitize होते थे! सुदूर ग्राम में ये प्रथा आज भी जीवित है जहां चूल्हे पर भोजन तैयार होता है!
सबसे अधिक मुख्य था भोजन बनाने वाले के भाव! परिवार की लेडीज की देख रेख में या खुद उनके द्वारा भोजन तैयार किया जाता था! उनके मनोभाव परिवार के प्रेम से सने होते थे और भोजन प्रसाद के तरह ही बनता था! क्यूकि उस भोजन का सबसे पहले भोग भगवान को लगाया जाता था! तब उस प्रसाद को बाकि सब घर के लोग ग्रहण करते थे! आज बदलते वातावरण में ये सब संभव नहीं है परन्तु इतना तो किया ही जा सकता है
- निश्चित समय पर आहार लिया जाना चाहिए!
- घर का बना हुआ आहार ही लेने का प्रयास करे!
- प्रातः चाहें थोड़ा जल्दी उठकर पति पत्नी दोनों साथ आहार तैयार करे और ऐसी भावना करे की हम भगवन के लिए प्रसाद तैयार कर रहे है! और भगवन का भोग जरूर लगाए!
शाम को ऑफिस से आकर भी चाहें सदा ही हो लकिन घर का बना भोजन करने का प्रयास करे!
क्या ही अच्छा हो हम भोजन करने से पहले ये विचार करे कि क्या ये भोजन मेरे लिए अच्छा है या नहीं
मन पसंद आहार सामने आते ही हम अपना नियंत्रण खो देते है! और बिना विचारे खाने लगते है कोई विवाह आदि उत्सवों पर टूट कर पड़ते है और इतना खा लेते है की अपच हो जाता है!
आहार भगवान के द्वारा दिया हुआ प्रसाद है इस जीवन को सुचारु रूप से चलने के लिए! इसिलए बहुत सोच समझ कर भगवान का ध्यान करते हुए आहार ग्रहण करना चाहिए! यह भी एक यज्ञ है